अगले दिन......
ज्योति मिश्रा पुलिस स्टेशन आई और एफ आई आर दर्ज करवा कर चली गई। अब काम था पुलिस का ..'''मुजरिम को पकड़ना। पुलिस अपना काम ईमानदारी से करने लगे विष्णुगढ़ के उच्च पुलिस थाने अधिकारी का नाम संदीप यादव था ,जो दिखने में किसी जिम व्यक्ति से कम नहीं लगता था। संदीप यादव का काम करने का तरीका कुछ अलग ही था।
वह पुनः उस जगह अपनी टीम को लेकर गया और आस-पास के एरिया को देखने लगा।
संदीप यादव ने अपनी टीम से कहा -"औ....देखो आस-पास कोई सामान या सबूत मिलता है कि नहीं ?ध्यान से चेक करना।
ओके..सर जी !संदीप यादव जब आस-पास देख रहे थे तो उसे कुछ सामान मिला। जहां पर एक्सीडेंट हुआ था वहां से दो पग दूरी में एक चैन मिली ।जिसमें डिजाइन से s लिखा हुआ था और साथ ही साथ हरे रंग की थोड़ी सी पेंट।
अब पुलिस के पास 2 चीजें थी जिससे मुजरिम के पास पहुंचा जा सके। चैन के जरिए और रंग के जरिए...?
लेकिन चैन के जरिए और रंग के जरिए मुजरिम के पास पहुंचना बहुत मुश्किल था।
पुलिस ने पहले आस-पास के दुकानदारों से पूछताछ किया। फिर उस एरिया के आसपास ऐसे तो चैन दुकाने थे। पहला का नाम था औसके शॉप और दूसरा का नाम था राम मोहन चैन दुकान ।दोनों दुकानों से पूछताछ किया कि-" क्या ये चैन आप ही के दुकान से खरीदा गया था।
....राममोहन चैन दुकान के दुकानदार ने कहा-"ये चैन हमारे ही यहां से खरीदा गया था ।
पुलिस ने कहा-"क्या आप मुझे उसका नाम बता सकते हैं जिन्होंने यह चैन खरीदा था ।..
साहब आप कैसी बात कर रहे हैं... इस दुकान में ना जाने कितने लोग हर रोज आते हैं। अब क्या मैं सबका चेहरा और नाम याद रखता हूं।नहीं साहब हमें नहीं पता ....!
पुलिस ने कहा -"अच्छा! कुछ भी याद है ...जरा सोचकर बताइए ।
दुकानदार ने कुछ क्षणों के लिए सोचा ...और कहा -"हां साहब उसके हाथ में एक टैटू छपी हुई थी ।और बाल लंबे थे।
पुलिस ने फिर उससे कहा -"क्या आप उसका चेहरा बता सकते हैं ।पुलिस ने एक चित्रकार को बुलाया और दुकानदार उस आदमी का शक्ल बताते गया। दुकानदार जैसा बोलता गया चित्रकार वैसा ही चित्र बनाता गया। चित्र बनकर तैयार हुआ और पुलिस ने उस चित्र को देखा। उस चित्र के जरिए पुलिस एक मुजरिम के पास पहुंच चुका था ।उस मुजरिम को थाना लाया गया और पूछ-ताछ किया गया।
मुजरिम ने तीनों साथियों के नाम बता दिए, जो उनके साथ थे। उसके बाद उन चारों मुजरिमों को कोर्ट में पेश किया गया और कोर्ट ने उन्हें 4 साल का सजा सुनाई ।और कोर्ट ने साथ-ही -साथ ज्योति मिश्रा को आर्थिक मुआवजा दिया गया ।उन्हें रांची में रहने के लिए एक घर और चार लाख रूपए सरकार की ओर से दी गई।....
ज्योति मिश्रा कुछ दिनों में रांची शिफ्ट हो गई। वे राॅंची के कुल्हा नगर में रहने लगी।
कुछ महीने बाद..
ज्योति मिश्रा के घर में कोई कमाने वाला नहीं था और समय के साथ उनका बैंक सेविंग ,बैलेंस धीरे-धीरे खत्म होने की दारर में था। इसलिए ज्योति मिश्रा ने निर्णय लिया कि मैं कोई जॉब करूंगा। उन्होंने एक शिक्षक के रूप में सरकारी स्कूल में जॉब ले ली। वह दिन भर बहुत मेहनत करती थी।
..... इसका अनुमान आप स्वयं लगा सकते हैं,कि जिस घर में एक औरत और उसका 4 साल का बच्चा हो। उसकी तकलीफ कैसी रही होगी। सुबह से लेकर शाम तक अपनी जीविका चलाने के लिए मेहनत करती थी। इसी तरह 6 साल बीत गये।....
कार्तिक स्कूल जाने लगा था। कार्तिक अपने ही नगर के सच्चिदानंद भाव्य विद्यालय में पढ़ने लगा था। कार्तिक बहुत ही होनहार छात्र था। कार्तिक ने अपनी 10th तथा 12th की परीक्षा इसी विद्यालय से प्राप्त की थी। कार्तिक ने 10th में 96% नंबर लाकर विद्यालय में प्रथम स्थान प्राप्त किया था। और उसने ट्वेल्थ में भी 93% लाकर विद्यालय में प्रथम स्थान प्राप्त किया था।
...लेकिन जीवन में अच्छे परसेंटेज लाना ही सब कुछ नहीं होता। जीवन में आगे बढ़ने या अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए आर्थिक सहायता बहुत मायने रखता है।
.. कार्तिक के पास सब कुछ था ।अच्छी परसेंटेज ,टैलेंट। लेकिन उसके आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी ।उनकी मां कार्तिक को ज्यादा नहीं पढ़ा सकी थी ।क्योंकि उनके पास इतने पैसे नहीं थे। लेकिन कार्तिक को पढ़ने की बहुत इच्छा थी। इसलिए उन्होंने अपनी मां से कहा -"मां ,मैं आगे और पढ़ना चाहता हूं। मेरा सपना है कि मैं किसी बड़ी सॉफ्टवेयर कंपनी में जॉब करूं ।
लेकिन मां ने बहुत प्रेम से उत्तर दिया-" बेटे तुम जरूर सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनना ,।
लेकिन मां मुझे आगे की पढ़ाई के लिए पैसे चाहिए ।
मां ने कहा-" कितने?
करीब ₹600000 । मैं बेंगलुरु के भव्य विश्वविद्यालय में पढ़ना चाहता हूं ।और एडमिशन करवाने के लिए लगभग ₹600000 चाहिए।
मां ने कहा-" बेटा हमारे पास इतने पैसे कहां है कि मैं तुम्हें उस भव्मेंय विश्वविद्यालय में एडमिशन दिला सको।
कार्तिक _"मां मुझे पता है कि आप के पास मुझे पढ़ाने के लिए पैसे नहीं हैं।
कार्तिक और मां के बीच बेहद बेचैनी वाली बात हो रही थी। तभी वहां श्यामलाल चाचा जी आ गए। उन्होंने ज्योति मिश्रा और कार्तिक के बात पूरी सुन ली थी।
".. श्यामलाल ज्योति मिश्रा का पड़ोसी था ।उसके हर दुख -सुख में शामिल होता था ।आधे से अधिक काम तो उसके घर का श्यामलाल करता था। बिजली का बिल भरने से ले कर राशन लाना तक। ज्योति मिश्रा श्यामलाल को अपने बड़े भाई के जैसा मानता था।
श्यामलाल ने कहा-" क्या बहस चल रही है मां बेटे के बीच।" श्यामलाल उनकी बातों को पूरा सुन चुका था ।शायद वे ऐसा इसलिए किया कि वे उस पर कोई इस तरह का शक ना करें या उससे बात करने के लिए।....
मां और बेटे का शक्ल उतरा हुआ था। श्यामलाल ने धीमी आवाज में कहा-" कुछ समस्या है क्या भाभी जी ?मुझे बताओ।
हालांकि श्यामलाल सारी बातों को जानते हुए भी अनजान बन रहे थे ।वह चाह रहे थे कि वह अपनी समस्या बताएं ताकि मैं उनकी मदद कर सको।..
ज्योति मिश्रा ने कहा -"कुछ नहीं भाई जी। बस वैसे ही आज मन उतरा हुआ है। ज्योति मिश्रा ने बात टालने की कोशिश बहुत की ।लेकिन वह बात को टालना ना सकी। ज्योति मिश्रा ने अपनी पूरी समस्या अपनी वाणी से बता दी। फिर श्यामलाल ने कहा -"बस इतनी छोटी सी बात। आप मुझसे पैसे ले लीजिए।
ज्योति मिश्रा ने कहा -"नहीं भाई जी !मैं आपसे पैसे कैसे ले सकती हूं। आपने पहले ही हमारे लिए बहुत कुछ कर दिया है। और अब हम अहशान मत कीजिए।
श्यामलाल ने कहा -"यह कैसी बात कर रहे हैं। आपको अभी पैसों की जरूरत है। कार्तिक का भविष्य का सवाल है। आप नहीं चाहते कि कार्तिकी अच्छा जॉब और अच्छा आदमी बने।
ज्योति मिश्रा ने कहा-" हां !मैं चाहती हूं कि कार्तिक एक अच्छा जॉब और अच्छा आदमी बने ।लेकिन......
श्यामलाल ने कहा-" लेकिन- वेकिन ...कुछ नहीं !बस आप मेरे से सारे पैसे ले लीजिए।
ठीक है। फिर मैं आपको ये चुकाऊंगा कैसे?..
श्यामलाल ने हंसकर कहा -"यूं....जब कार्तिक का नौकरी लग जाएगा तब तब मुझे सारे पैसे दे दीजिएगा।
ज्योति मिश्रा ने उन्हें दिल से धन्यवाद किया और वे दरवाजे से बाहर चले गए।...